झारखंडी सिनेमा की नई उड़ान, स्थानीय फिल्मकारों ने बनाई राष्ट्रीय और वैश्विक पहचान

Jul 23, 2026 - 14:14
 0  8
झारखंडी सिनेमा की नई उड़ान, स्थानीय फिल्मकारों ने बनाई राष्ट्रीय और वैश्विक पहचान

रांची
झारखंड की अपनी सिनेमाई भाषा का महत्वपूर्ण विस्तार उसके आदिवासी और जनजातीय सिनेमा में दिखाई देता है. अब सवाल सिर्फ यह नहीं रह गया है कि झारखंड को कौन फिल्मा रहा है बल्कि यह है कि झारखंड अपनी भाषाओं में खुद को किस तरह पर्दे पर प्रस्तुत कर रहा है. इस कड़ी में कई महत्वपूर्ण नाम सामने आते हैं, जिनमें कुछ प्रमुख फिल्मकारों का उल्लेख यहां किया जा रहा है. रांची के विनोद कुमार उन शुरुआती फिल्मकारों में शामिल हैं, जिन्होंने स्थानीय आदिवासी समाज और संस्कृति को केंद्र में रखकर झारखंड में फीचर फिल्म बनाने का साहस किया. उनकी फिल्म ‘अक्रांत’ (1988) इस दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जाती है. दूरदर्शन पर प्रसारण और मुंबई के पैनोरमा में शामिल होने से फिल्म को व्यापक पहचान मिली.

बुसान से लेकर कान्स और नेशनल अवॉर्ड्स तक का सफर
युवा निर्देशक निरंजन कुजूर की फिल्म ‘दुई जागर’ वर्ष 2024 में बुसान अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के न्यू करंट्स खंड के लिए चयनित हुई. वर्ष 2025 के मामी मुंबई फिल्म फेस्टिवल में भारतीय प्रीमियर हुआ. संताली फिल्मकार रवि राज मुर्मू ने संताली भाषा में फिल्म निर्माण को नयी पहचान दिलाई और राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार हासिल किया. रांची से निकले नीरज शुक्ला ने शाहरुख खान अभिनीत फिल्म ‘रईस’ जैसी फिल्म की पटकथा लिखी.

यूरेनियम खनन से लेकर लालफीताशाही पर करारा प्रहार
रांची के ही अभिनेता राजेश जैश भी फिल्म जगत में पहचान बना चुके हैं. सतीश मुंडा का नाम भी महत्वपूर्ण है. इनकी डिप्लोमा फिल्म ‘दंश’ को कई पुरस्कार मिले. डॉक्यूमेंट्री ‘दृष्टि’ के बाद यूरेनियम खनन जैसे अनदेखे विषय पर बनी फिल्म ‘जादूगोड़ा’ ने उन्हें अलग पहचान दिलाई. वर्ष 2022 में राहुल भट और प्रिया बापट अभिनीत उनकी पहली फीचर फिल्म ‘चक्की’ रिलीज हुई.

रिलीज से पहले जीते 21 पुरस्कार
सिमडेगा में जन्मे लेखक-निर्देशक-संपादक एनपीके पुरुषोत्तम का नाम भी जुड़ता है. चर्चित लघु फिल्म ‘बंधा खेत’ कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में चयनित हुई. नागपुरी फिल्म ‘सेरेंग’ की व्यावसायिक सफलता ने साबित किया कि क्षेत्रीय भाषा का सिनेमा दर्शकों तक पहुंचने की क्षमता रखता है. कुड़ुख सिनेमा और झारखंडी संगीत की दुनिया में सुरेंद्र कुजूर पिछले दो दशकों से सक्रिय महत्वपूर्ण नाम हैं. वर्ष 2025 में दिल्ली के गणतंत्र दिवस समारोह में निकाली झांकी में म्यूजिक डायरेक्टर के रूप में इस झांकी को देश की सर्वश्रेष्ठ झांकी का पुरस्कार मिला. पलामू के युवा फिल्म निर्देशक प्रवीण तिवारी नयी पीढ़ी की उस आकांक्षा का प्रतिनिधित्व करते हैं. रिलीज से पहले 21 पुरस्कार हासिल किये हैं.

‘लोहरदगा’ और ‘फुलमनिया’ जैसी फिल्मों का किया निर्देशन
लोहरदगा के किस्को प्रखंड के हेसापिरी गांव से निकले लाल विजय शाहदेव की यात्रा थिएटर से शुरू होकर कास्टिंग, लेखन, टेलीविजन निर्माण और निर्देशन तक पहुंची. उनकी फिल्म ‘द साइलेंट स्टैच्यू’ वर्ष 2016 के कान्स फिल्म फेस्टिवल के शॉर्ट फिल्म कॉर्नर में शामिल हुई. उन्होंने ‘लोहरदगा’ और ‘फुलमनिया’ जैसी फिल्मों का निर्देशन किया. इसी क्रम में रांची के अनुज कुमार ने कथा और वृत्तचित्र, दोनों माध्यमों में उल्लेखनीय काम किया है. आज झारखंड किसी और के कैमरे का विषय भर नहीं है. वह खुद कैमरा उठाकर अपनी कहानी कह रहा है.

What's Your Reaction?

Like Like 0
Dislike Dislike 0
Love Love 0
Funny Funny 0
Angry Angry 0
Sad Sad 0
Wow Wow 0