भिंड विकास की दौड़ में क्यों पिछड़ा?
रेत से रोजगार तक—ग्रामीण भिंड की परेशानियां मांग रही हैं जनप्रतिनिधियों से जवाब
अमरकांत सिंह चौहान
भिंड (साहस समाचार ) चंबल अंचल में भिंड की अपनी एक अलग पहचान रही है। राजनीति हो, उद्योग हो या पत्रकारिता—इस जिले के लोगों ने विभिन्न क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा और क्षमता का परिचय दिया है। बुजुर्गों के बीच आज भी यह चर्चा होती है कि कभी भूताजी की कोठी में मध्यप्रदेश सरकार की कैबिनेट बैठक तक हुआ करती थी। इसके बावजूद आज भिंड विकास के कई महत्वपूर्ण मानकों पर अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ पाया है।
सवाल यह नहीं है कि भिंड में विकास कार्य नहीं हुए। सवाल यह है कि दशकों से जारी योजनाओं, घोषणाओं और राजनीतिक दावों के बावजूद विकास का प्रभाव आम आदमी की जिंदगी में उतनी मजबूती से क्यों नहीं दिखाई देता?
किसी जिले की तरक्की का पैमाना केवल बड़ी घोषणाएं, शिलान्यास और कागजों पर दर्ज योजनाएं नहीं होतीं। वास्तविक विकास तब माना जाता है, जब गांव का सामान्य नागरिक अपने जीवन में बदलाव महसूस करे, किसान को बेहतर सुविधाएं मिलें, युवाओं को रोजगार मिले, सड़क और स्वास्थ्य व्यवस्था मजबूत हो तथा लोगों को छोटी-बड़ी जरूरतों के लिए दूसरे शहरों की ओर पलायन न करना पड़े।
गौरी सरोवर: सौंदर्यीकरण ज्यादा, सफाई कम?
भिंड के विकास की चर्चा गौरी सरोवर के बिना अधूरी है। शहर की पहचान से जुड़े इस ऐतिहासिक जलाशय के सौंदर्यीकरण पर समय-समय पर योजनाएं और खर्च होते रहे हैं। लेकिन इसके बावजूद सरोवर की वास्तविक सफाई और संरक्षण को लेकर सवाल उठते रहे हैं।
जनता का सवाल सीधा है—यदि वर्षों से सौंदर्यीकरण पर काम हो रहा है, तो फिर जलाशय की मूल समस्याओं का स्थायी समाधान क्यों नहीं हो पा रहा?
विकास का उद्देश्य केवल परियोजनाएं बनाना नहीं, बल्कि उनका स्थायी और उपयोगी परिणाम सुनिश्चित करना होना चाहिए।
रेत: प्राकृतिक संपदा या ग्रामीण के लिए परेशानी?
ग्रामीण भिंड की समस्याओं में रेत का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है। आम ग्रामीण अपना घर बनाना चाहता है, पुराने मकान की मरम्मत करवाना चाहता है या छोटा निर्माण कार्य करना चाहता है, लेकिन रेत की उपलब्धता, कीमत और परिवहन से जुड़ी परेशानियां उसके सामने खड़ी हो जाती हैं।
प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग कानून और पर्यावरणीय नियमों के अनुरूप होना चाहिए। वैध खनन हो, व्यवस्था पारदर्शी हो, सरकार को उचित राजस्व मिले और आम नागरिक को भी उचित कीमत पर निर्माण सामग्री उपलब्ध हो—इन सभी के बीच संतुलन जरूरी है।
सवाल यह है कि जिस क्षेत्र के पास प्राकृतिक संसाधन हैं, उसी क्षेत्र का आम नागरिक उन संसाधनों की उपलब्धता और कीमत को लेकर परेशान क्यों रहे?
जनप्रतिनिधियों से जनता के सीधे सवाल
चुनाव के दौरान गांव-गांव पहुंचने वाले जनप्रतिनिधियों से अब जनता कुछ बुनियादी सवालों के जवाब चाहती है—
क्या गांवों की समस्याओं का स्थायी समाधान हुआ?
क्या युवाओं के लिए पर्याप्त स्थानीय रोजगार के अवसर पैदा हुए?
क्या किसानों को सिंचाई, बिजली, बाजार और उचित मूल्य की पर्याप्त सुविधाएं मिलीं?
क्या ग्रामीण सड़कों और मूलभूत सुविधाओं में अपेक्षित सुधार हुआ?
क्या प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित हुई?
इन सवालों के जवाब केवल भाषणों और घोषणाओं में नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाले परिणामों में मिलने चाहिए।
युवा बाहर जा रहा है तो विकास की कहानी अधूरी है
भिंड के युवाओं में प्रतिभा और मेहनत की कमी नहीं है। कमी है तो पर्याप्त अवसरों की। रोजगार और बेहतर भविष्य की तलाश में बड़ी संख्या में युवाओं को दूसरे शहरों की ओर जाना पड़ता है।
किसी जिले का युवा यदि अपने ही जिले में भविष्य तलाशने के बजाय बाहर जाने को मजबूर हो, तो यह केवल उसके परिवार की समस्या नहीं होती। यह स्थानीय अर्थव्यवस्था, रोजगार नीति और विकास की दिशा पर भी सवाल खड़ा करता है।
भिंड में छोटे उद्योगों, कृषि आधारित कारोबार, कौशल विकास, स्थानीय उद्यमिता और निजी निवेश को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। युवाओं के सामने पलायन मजबूरी नहीं, स्थानीय रोजगार विकल्प होना चाहिए।
किसान मजबूत होगा तो भिंड मजबूत होगा
भिंड की अर्थव्यवस्था में ग्रामीण क्षेत्र और कृषि की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। इसलिए जिले के विकास की वास्तविक राह गांवों से होकर गुजरती है।
किसान को केवल घोषणाएं नहीं चाहिए। उसे सिंचाई, बिजली, बेहतर सड़क, भंडारण, परिवहन, बाजार और उसकी उपज का उचित मूल्य चाहिए।
जब किसान की आय और आर्थिक स्थिति मजबूत होती है तो उसका असर पूरे ग्रामीण बाजार पर पड़ता है। दुकानदारों से लेकर मजदूरों और छोटे कारोबारियों तक स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति मिलती है।
इसलिए भिंड की विकास नीति में किसान और गांव को केंद्र में रखना अनिवार्य है।
जवाबदेही केवल नेताओं की नहीं, जनता की भी
जनप्रतिनिधियों से सवाल करना लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन जनता की भी जिम्मेदारी है कि वह अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहे।
सरकारी योजनाओं और विकास कार्यों की जानकारी मांगी जाए। पंचायत से लेकर जिला स्तर तक होने वाले कार्यों की निगरानी हो। जनता अपनी समस्याओं को लोकतांत्रिक तरीके से उठाए और अपने प्रतिनिधियों से उनके काम का हिसाब मांगे।
क्योंकि लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि जनता के प्रतिनिधि होते हैं, जनता के मालिक नहीं।
वोट देना अधिकार है, लेकिन पांच साल तक सवाल पूछना भी उतना ही महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक अधिकार है।
भिंड को अब नई विकास सोच की जरूरत
भिंड को विकास की मुख्यधारा में तेजी से आगे बढ़ाने के लिए राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर स्पष्ट और दीर्घकालिक विकास नीति की जरूरत है।
ग्रामीण सड़कें, पेयजल, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, कृषि, सिंचाई और प्राकृतिक संसाधनों का पारदर्शी प्रबंधन विकास की प्राथमिकताओं में शामिल होना चाहिए।
रेत के मामले में वैध व्यवस्था को मजबूत करने के साथ अवैध गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण जरूरी है। साथ ही नीति बनाते समय उस आम नागरिक की परेशानी को भी ध्यान में रखना होगा, जिसे अपने घर के निर्माण के लिए रेत की जरूरत है।
विकास का मतलब केवल शहर की चमक नहीं है।
वास्तविक विकास तब होगा, जब भिंड के दूर-दराज के गांव में रहने वाला व्यक्ति भी यह कह सके कि उसके जीवन में बदलाव आया है।
भिंड को अब वादे नहीं, परिणाम चाहिए
भिंड की जनता ने वर्षों से चुनावी घोषणाएं सुनी हैं, विकास के दावे देखे हैं और योजनाओं के नाम भी सुने हैं। अब जनता परिणाम चाहती है।
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