MP हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, ADPO भर्ती में 10% पदोन्नति कोटा किया रद्द

Oct 31, 2026 - 09:44
 0  9
MP हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, ADPO भर्ती में 10% पदोन्नति कोटा किया रद्द

ग्वालियर
 मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने सहायक जिला लोक अभियोजन अधिकारी (एडीपीओ) के पदों पर विभागीय कर्मचारियों को मिलने वाला 10 प्रतिशत पदोन्नति कोटा असंवैधानिक घोषित कर दिया है।

फैसले के बाद एडीपीओ के पदों पर आगे कोई नहीं होगी पदोन्नति
कोर्ट ने वर्ष 2002 में किए गए नियम संशोधन को संविधान के अनुच्छेद 14, 16 और 21 का उल्लंघन मानते हुए निरस्त कर दिया। स्पष्ट किया कि इस फैसले के बाद एडीपीओ के पदों पर आगे कोई पदोन्नति नहीं की जा सकेगी। हालांकि, फैसले से पहले इस कोटे के तहत हो चुकी पदोन्नतियां प्रभावित नहीं होंगी। न्यायमूर्ति जीएस अहलूवालिया और न्यायमूर्ति अनुराधा शुक्ला की युगलपीठ ने रोहन शर्मा और करण श्रीवास्तव सहित अन्य की याचिकाओं पर यह फैसला सुनाया।

लिपिकीय कर्मचारियों को सीधे अधिकारी बनाने पर सवाल
मामले में वर्ष 2002 में मध्य प्रदेश लोक अभियोजन (राजपत्रित सेवा) भर्ती नियम, 1991 में संशोधन कर एडीपीओ के 10 प्रतिशत पद विभागीय पदोन्नति से भरने का प्रविधान किया गया था। इसके तहत सीआरपीसी क्लर्क, सहायक ग्रेड-तीन और एपीसीडी ग्रेड-तीन के ऐसे कर्मचारियों को पात्र बनाया गया था, जिनके पास विधि स्नातक की डिग्री, सात वर्ष का विभागीय अनुभव और निर्धारित आयु सीमा की शर्तें थीं। शेष 90 प्रतिशत पद सीधी भर्ती से भरे जाने थे।

याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि ये कर्मचारी मूल रूप से लिपिकीय काम करते हैं। उन्हें अदालत में पैरवी करने, गवाहों से पूछताछ करने या मुकदमों का संचालन करने का अनुभव नहीं होता। इसके बावजूद केवल विधि की डिग्री के आधार पर उन्हें द्वितीय श्रेणी के अभियोजन अधिकारी के पद पर पदोन्नति का रास्ता देना उचित नहीं है।

सरकार नहीं बता सकी संशोधन का आधार
कोर्ट ने पाया कि राज्य सरकार यह स्पष्ट नहीं कर सकी कि एक ही लिपिकीय संवर्ग में विधि स्नातक कर्मचारियों को अलग श्रेणी में रखकर सीधे एडीपीओ बनाने का आधार क्या था। कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि इन कर्मचारियों के लिए पहले से तृतीय श्रेणी के संवर्ग में पदोन्नति की व्यवस्था मौजूद है। ऐसे में एक ही पद से दो अलग-अलग पदोन्नति मार्ग बनाना उचित नहीं है।

कोर्ट के अनुसार लोक अभियोजक का दायित्व केवल सरकारी पक्ष रखना नहीं, बल्कि निष्पक्ष और प्रभावी ढंग से न्यायिक प्रक्रिया में सहायता करना है। इसके लिए कानून का व्यावहारिक ज्ञान और वकालत का अनुभव महत्वपूर्ण है। अदालत ने कहा कि लिपिकीय संवर्ग के कर्मचारियों को सीधे एडीपीओ बनाने की व्यवस्था मनमानी है और इससे न्याय व्यवस्था तथा नागरिकों के अधिकारों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

 

What's Your Reaction?

Like Like 0
Dislike Dislike 0
Love Love 0
Funny Funny 0
Angry Angry 0
Sad Sad 0
Wow Wow 0