पटना स्नातक MLC चुनाव में नीरज कुमार की जीत, अनंत सिंह के विरोध के बावजूद JDU उम्मीदवार ने मारी बाजी

Oct 28, 2026 - 11:44
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पटना स्नातक MLC चुनाव में नीरज कुमार की जीत, अनंत सिंह के विरोध के बावजूद JDU उम्मीदवार ने मारी बाजी

पटना 
बिहार विधान परिषद (एमएलसी) के पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव नतीजों ने सूबे की राजनीति में 'मसल पावर' और 'संगठनात्मक साख' की जंग पर मुहर लगा दी है. मोकामा के बाहुबली विधायक अनंत सिंह, जिन्होंने अपनी ही पार्टी जेडीयू के अधिकृत उम्मीदवार और वरिष्ठ नेता नीरज कुमार के खिलाफ खुला मोर्चा खोला था, वे इस सियासी बाजी में पूरी तरह पस्त नजर आए। 

अनंत सिंह के खुला विरोध और जन सुराज समर्थित प्रत्याशी अनुज कुमार का समर्थन करने के बावजूद, जेडीयू के नीरज कुमार ने अपनी जीत का परचम फहरा दिया है. पटना स्नातक सीट से जेडीयू के नीरज कुमार ने आरजेडी के उम्मीदवार को हराया. अनंत सिंह जिस अनुज कुमार के समर्थन में खड़े थे, वह तीसरे नंबर पर रहे। 

पटना स्नातक सीट पर नीरज कुमार की जीत के बाद सवाल उठता है कि आखिर उनके पास वह कौन सी राजनीतिक और सांगठनिक ताकत थी, जिससे टकराकर 'छोटे सरकार' के नाम से मशहूर अनंत सिंह क्लीन बोल्ड हो गए. अनंत सिंह को न केवल चुनावी शिकस्त की कसक झेलनी पड़ी, बल्कि पार्टी से 6 साल के लिए निष्कासन का सामना भी करना पड़ा। 

नीरज कुमार ने दिया अनंत सिंह को झटका
बिहार का एमएलसी चुनाव नीरज कुमार के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया था, क्योंकि उनकी ही पार्टी के विधायक अनंत सिंह ने उन्हें हराने की कसम तक खा ली थी. इसके बाद अनंत सिंह जन सुराज समर्थित उम्मीदवार अनुज सिंह के समर्थन में खुलकर उतर गए और नीरज कुमार को हराने के लिए दिन-रात एक कर दिया. इसके चलते अनंत सिंह को जेडीयू से बाहर भी होना पड़ा। 

नीरज कुमार के लिए चुनाव हारने का मतलब था कि उनकी प्रतिष्ठा पर बड़ा सवाल खड़ा होता, लेकिन नीरज कुमार इन तमाम विरोध के बाद भी अपनी सीट बचा ले गए. जीत के बाद नीरज कुमार ने अपनी जीत का श्रेय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सहित एनडीए नेताओं को दिया. नीरज कुमार की जीत के पीछे वह वोटर थे, जिनका उन पर भरोसा बरकरार रहा। 

अनंत फ्लावर समझे, फायर निकले नीरज कुमार
मोकामा के बाहुबली विधायक अनंत सिंह ने अपनी पुरानी सियासी रंजिश के चलते जेडीयू के अधिकृत प्रत्याशी और अनुभवी नेता नीरज कुमार के खिलाफ खुला मोर्चा खोला था. उन्हें शायद यह गुमान था कि उनके एक इशारे पर समीकरण बदल जाएंगे और वह अपने विरोधी को चारों खाने चित कर देंगे, लेकिन धरातल पर नतीजे इसके बिल्कुल उलट आए। 

अनंत सिंह जिस जन सुराज समर्थित प्रत्याशी के समर्थन में अपनी पूरी ताकत झोंके हुए थे, वह तीसरे पायदान पर सिमट गया, जबकि नीरज कुमार ने तमाम विरोध और बगावत को दरकिनार करते हुए शानदार जीत का परचम लहरा दिया. यह मुकाबला महज़ दो नेताओं की व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का नहीं, बल्कि 'मसल पावर' बनाम 'पॉलिटिकल सॉलिडिटी' की एक बड़ी वैचारिक जंग बन गया था. नीरज सिंह ने अनंत सिंह के सारे दावे को हवा में उड़ा दिया। 

बेदाग छवि और स्नातकों के बीच गहरी पैठ
नीरज कुमार लंबे समय से पटना स्नातक क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते आ रहे हैं. वह तीन बार से एमएलसी रह चुके हैं और उन्होंने लगातार अपने मतदाता जोड़े हैं. इस चुनाव के मतदाता वर्ग में वकील, डॉक्टर, प्रोफेसर, शिक्षक और शिक्षित युवा शामिल हैं. नीरज कुमार की पहचान एक पढ़े-लिखे, तार्किक और प्रखर वक्ता की रही है। 

दबंगई की राजनीति से इतर उन्होंने बौद्धिक वर्ग से संवाद का जो सेतु बनाया था, उसने बाहुबल के प्रभाव को मतदाता तक पहुंचने से पहले ही बेअसर कर दिया. अनंत सिंह के अनुज सिंह के समर्थन में उतरने से पटना सीट का पढ़ा-लिखा तबका और दूर हो गया, जिसके चलते वह तीसरे नंबर पर रहे। 

'पार्टी कैडर' और एनडीए का मजबूत संगठन
अनंत सिंह का व्यक्तिगत प्रभाव एक खास इलाके और जातीय समीकरण तक सीमित रहा है, लेकिन नीरज कुमार के पीछे जेडीयू और एनडीए का पूरा संगठनात्मक ढांचा खड़ा था. चुनाव में जदयू के जमीनी कार्यकर्ताओं ने बूथ स्तर पर मोर्चा संभाला. वहीं, अनंत सिंह द्वारा पार्टी से बगावत करने पर एनडीए कैडर ने एकजुट होकर नीरज कुमार के पक्ष में गोलबंदी की. यह चुनाव सिर्फ एक इलाके तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें पटना प्रमंडल के तहत आने वाले अन्य जिले भी शामिल थे। 

नीरज कुमार जेडीयू के मुख्य प्रवक्ता हैं और नीतीश कुमार के सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में गिने जाते हैं. जब अनंत सिंह ने बगावत की, तो पार्टी ने जरा भी हिचकिचाहट नहीं दिखाई. जदयू ने न केवल अनंत सिंह और उनकी पत्नी नीलम देवी को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया, बल्कि उनकी विधानसभा सदस्यता रद्द करने की भी सिफारिश कर दी. इस सख्त फैसले से यह साफ संदेश गया कि पार्टी नीरज कुमार के साथ मजबूती से खड़ी है, जिसका पूरा लाभ नीरज कुमार को मिला। 

नीरज कुमार की सबसे बड़ी ताकत उनकी वाकपटुता और बेबाक शैली है. अनंत सिंह के व्यक्तिगत हमलों और 'पेटी भरकर वोट' दिलाने के दावों के सामने नीरज कुमार ने मुद्दे आधारित राजनीति रखी. उन्होंने सार्वजनिक मंचों पर साफ कहा कि बिहार में अब बाहुबल का दौर खत्म हो चुका है. इसके अलावा नीरज कुमार और अनंत सिंह दोनों ही भूमिहार समुदाय से आते हैं, लेकिन एमएलसी चुनाव में मतदाताओं ने नीरज कुमार की कार्यशैली के पक्ष में खुलकर मतदान किया। 

अनंत सिंह का दांव कैसे पड़ गया उल्टा
2015 के मोकामा चुनाव और 2019 के हथियार मामले के वक्त से ही अनंत सिंह और नीरज कुमार के बीच कड़वाहट चली आ रही थी. इस बार एमएलसी चुनाव में अनंत सिंह ने पुरानी खुन्नस निकालने के लिए जन सुराज के प्रत्याशी डॉ. अनुज सिंह को अपना समर्थन दिया और दावा किया कि वह नीरज कुमार की जमानत जब्त करा देंगे, लेकिन सियासी बाजी पूरी तरह नीरज कुमार के नाम रही। 

एमएलसी चुनाव के नतीजों ने साबित कर दिया कि स्नातक और बौद्धिक मतदाता किसी बाहुबली के एक इशारे पर अपना मत नहीं बदलते. अनंत सिंह का यह दांव न सिर्फ उल्टा पड़ा, बल्कि इसने उनकी खुद की राजनीतिक साख को गहरा धक्का पहुंचाया है। 

पटना स्नातक सीट पर नीरज कुमार की जीत यह संदेश देती है कि बिहार की राजनीति में अब 'रंगदारी' और 'बाहुबल' के बल पर पढ़े-लिखे वर्ग का जनादेश नहीं चुराया जा सकता. नीरज कुमार की सांगठनिक ताकत और बौद्धिक पकड़ के आगे अनंत सिंह का तिलिस्म पूरी तरह बिखर गया। 

 

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