बिहार का निर्यात 18,713 करोड़ पर पहुंचा, मखाना-लीची के बावजूद हिस्सेदारी 0.48%
पटना
निर्यात के मोर्चे पर बिहार की स्थिति कभी अच्छी रही नहीं। औद्योगिक आधार नहीं होना इसका प्रमुख कारण है। दूसरा कारण व्यवस्थागत सुस्ती है। अगर ऐसा नहीं होता तो कृषि और वानिकी के कई उत्पाद विदेशी बाजार में आज धूम मचा रहे होते।
इस श्रेणी में अलबत्ता मखाने का नाम लिया जाएगा, जो कि राजनीति का सुपर फूड हो गया है। यही कारण है कि निर्यात का सारा ढिंढोरा मखाने तक सिमट जा रहा। वास्तविकता यह है कि बिहार के कृषि व सहवर्ती उत्पाद और निर्यात में मखाने की मात्रा एक प्रतिशत भी नहीं।
2025-26 में बिहार से 18713.10 करोड़ रुपये के उत्पाद निर्यात किए गए। उसमें सर्वाधिक निर्यात पेट्रोलियम उत्पाद का हो रहा। फल और सब्जी की हिस्सेदारी 2.5 प्रतिशत से भी कम रही। मखाना और लीची इसी ढाई प्रतिशत के अंश हैं।
मखाना और लीची की पहचान बिहार से जुड़ी
मखाना और लीची की पहचान बिहार से जुड़ी हुई है। इनके अलावा भी कृषि-वानिकी के कई और उत्पाद हैं, जिनके उत्पाद में बिहार बादशाह है। मक्का, सिंघाड़ा, लौकी, मशरूम आदि इसी श्रेणी में हैं। प्रसंस्करण, वैल्यू एड, विपणन और निर्यात आदि की समुचित व्यवस्था नहीं होने से उत्पादकों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल रहा।
ऐसा तब जबकि बिहार की निर्यात प्रोत्साहन नीति भी है। वाणिज्यिक प्रतिस्पर्द्धा की कमतर स्थिति के कारण यह नीति बहुत प्रभाव नहीं छोड़ पा रही। इसके अलावा व्यवस्था को लालफीताशाही की आदत-सी हो गई है।
बिहार की हिस्सेदारी आधा प्रतिशत के आसपास
बहरहाल देश के कुल निर्यात में बिहार की हिस्सेदारी आधा प्रतिशत के आसपास झूल रही। पिछले एक दशक से यही स्थिति बनी हुई है। इससे आगे निकलने के प्रयास में जब कभी विफल हुए, तो सीधा बहाना लैंड-लॉक्ड राज्य होने का रहा। तब हम हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों की उपलब्धि को भूल गए, जो लैंड-लाक्ड होने के बावजूद निर्यात में बिहार से कोसों आगे हैं।
हालांकि, अब सरकार के स्तर से इसके लिए पहल हो रही, लेकिन वर्षों की जड़ता को तोड़ने की चुनौती बनी हुई है। अभी सिडबी की ओर से जगत साह बिहार के उद्यमियों-व्यापारियों को निर्यात के तौर-तरीके सिखा रहे। उनका कहना है कि उद्योग-उत्पाद के लिए रॉ-मेटेरियल चाहिए होता है। हम भूल जाते हैं कि निर्यात भी वस्तुत: रा-मेटेरियल ही है। बिहार को यही हुनर सीखना होगा।
दो की धूम
मखाना: देश का 80 प्रतिशत मखाना बिहार मेंं होता है। प्रतिवर्ष लगभग 40,000 टन प्रोसेस्ड मखाना का उत्पादन है। मिथिला मखाना को जीआइ टैग प्राप्त है। देश से मखाना का कुल निर्यात लगभग 25,130 टन है। यह अमेरिका, यूएई, कनाडा, आस्ट्रेलिया, नेपाल और ब्रिटेन आदि देशों को निर्यात होता है।
लीची: देश में लीची के कुल उत्पादन में बिहार की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत से तनिक अधिक है। इसी कारण बिहार को लीची का ''राजधानी'' कहा जाता है। प्रतिवर्ष 3,00,000 टन से कुछ अधिक लीची का उत्पादन होता है। शाही लीची को जीआई टैग मिला हुआ है। भारत से प्रतिवर्ष 5000 से 7000 टन लीची निर्यात की जाती है।
जीआई टैग प्राप्त बिहार के उत्पाद
मधुबनी पेंटिंग, मिथिला मखाना, शाही लीची, जर्दालु आम, कतरनी चावल, मगही पान, सिलाव का खाजा, मिर्चा धान, भागलपुर सिल्क , सुजनी कढ़ाई, खटवा (एप्लिक वर्क), सिक्की घास उत्पाद, मंजूषा कला, बावन बूटी साड़ी एवं फैब्रिक, पत्थरकट्टी स्टोन क्राफ्ट, पिड़िया चित्रकला
निर्यात (करोड़ रुपये में)
वित्तीय वर्ष बिहार
(करोड़ रुपये) भारत
(करोड़ रुपये) देश के निर्यात में बिहार की हिस्सेदारी
2021-22 17,219.63 31,47,021.49 0.55%
2022-23 20,895.04 36,21,549.88 0.58%
2023-24 16,760.79 36,18,952.27 0.46%
2024-25 17,283.18 37,03,412.02 0.47%
2025-26 18,713.10 39,03,730.60 0.48%
बिहार से निर्यात में हिस्सेदारी
पेट्रोलियम उत्पाद : 55.48%
भैंसा का मांस : 10.18%
चावल (बासमती से इतर) : 6.63%
ग्रेफाइट, विस्फोटक आदि : 5.03%
चावल से इतर अनाज : 4.01%
रेलवे परिवहन उपकरण : 3.48%
दवा फार्मूलेशन, बायोलॉजिकल्स : 2.01%
ताजा सब्जियां : 1.37%
टायर-ट्यूब : 1.13%
ताजा फल : 0.96%
कमी के कारण
बंदरगाहों के काफी दूर होने से परिवहन लागत अधिक
अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप आधारभूत संरचना नहीं
स्थानीय स्तर पर इंपोर्ट-एक्सपोर्ट कोड की कमी
उच्च मूल्य के औद्योगिक-तकनीकी उत्पाद वाले बड़े उद्योग कम
मूल्य संवर्द्धन (वैल्यू एडिशन) का अभाव
अपेक्षित पहल
बिहार निर्यात प्रोत्साहन नीति का प्रभावी क्रियान्वयन
एयर कार्गो और ड्राई पोर्ट का विकास
मेगा फूड पार्क्स और फूड प्रोसेसिंग क्लस्टर बनें
निर्यातकों के लिए प्रशिक्षण और जागरुकता
सप्लाई चेन के जोखिमों को कम करना
प्रोत्साहन की व्यवस्था
बिहार निर्यात प्रोत्साहन नीति राज्य के उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप ढालकर वैश्विक बाजारों तक पहुंचाने और निर्यात को गति देने के लिए बनाई गई है। इसके अंतर्गत कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण हस्तशिल्प और जीआइ टैग वाले उत्पादों को विशेष प्राथमिकता देने की व्यवस्था है।
एक्सपोर्ट हब: हर जिले को एक ‘एक्सपोर्ट हब’ के रूप में विकसित करना, जिससे स्थानीय उत्पादों को वैश्विक पहचान मिल सके।
बुनियादी ढांचा: विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) और निर्यात पैक हाउस जैसी आधुनिक लाजिस्टिक्स व बुनियादी सुविधाओं का विकास।
राहत अनुदान: बंदरगाह या एयर कार्गो टर्मिनल तक पहुंचने वाले पात्र उत्पादों के लिए फ्री आन बोर्ड मूल्य का एक प्रतिशत तक (सात वर्षों के लिए प्रति वित्तीय वर्ष 20 लाख रुपये तक) निर्यात सब्सिडी। पिछले वर्ष की तुलना में 50% से अधिक निर्यात वृद्धि प्राप्त करने वाली इकाइयों के लिए वृद्धिशील फ्री आन बोर्ड मूल्य पर अतिरिक्त एक प्रतिशत प्रतिपूर्ति (प्रति वर्ष 10 लाख रुपये तक)।
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