लुधियाना के किला रायपुर में फिर दौड़ेगी बैलगाड़ी, 11 साल बाद ग्रामीण ओलंपिक में वापसी, DC ने दिए नियमों के पालन के निर्देश

Jan 26, 2026 - 15:14
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लुधियाना के किला रायपुर में फिर दौड़ेगी बैलगाड़ी, 11 साल बाद ग्रामीण ओलंपिक में वापसी, DC ने दिए नियमों के पालन के निर्देश

चंडीगढ़ 

पंजाब में लुधियाना के किला रायपुर ग्रामीण ओलिंपिक में एक बार फिर से बैलगाड़ी दौड़ की वापसी होने जा रही है। किला रायपुर में जो खेल शुरू होंगे उनमें बैलगाड़ी की दौड़ का भी आयोजन इस बार किया जाएगा।

जिला प्रशासन, आयोजक और ग्रामीणों में इसे लेकर उत्साह है। 30 जनवरी से एक फरवरी तक ये गेम्स करवाई जानी हैं। डीसी हिमांशु जैन ने आज प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कहा कि यमों और कानून मुताबिक बैलगाड़ी की दौड़ होगी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 2014 में किला रायपुर गेम्स में बैलगाड़ी की दौड़ बंद करवा दी थी।

पंजाब सरकार ने 11 जुलाई को विधानसभा में बिल पास करके बैल गाड़ियों की दौड़ फिर से करवाने का रास्ता साफ कर दिया। सरकार के इस फैसले से इस बैलगाड़ी दौड़ शुरू होने का रास्ता साफ हुआ है। पिछले कुछ सालों से पंजाब सरकार इन खेलों का आयोजन कर रही है।

किला रायपुर खेलों की रौनक हो गई थी खत्म

बैल गाड़ियों की दौड़ शुरू से किला रायपुर खेलों में आकर्षण का मुख्य केंद्र रही हैं। जब किला रायपुर में बैलगाड़ियों की दौड़ पर प्रतिबंध लगा तो खेलों की रौनक ही खत्म हो गई। देश विदेश से पर्यटकों ने आना बंद कर दिया।

इन शर्तों पर शुरू करवाई जाएगी बैलगाड़ियों की दौड़

किसी भी तरह की मारपीट, नुकीले औजार या क्रूरता पूरी तरह प्रतिबंधित होगी

अत्यधिक गर्मी या खराब मौसम में दौड़ नहीं करवाई जाएगी

सभी प्रतिभागियों और बैलों का पूर्व पंजीकरण जरूरी होगा

नियमों का उल्लंघन करने पर कड़ी कार्रवाई और प्रतिबंध लगाया जाएगा

कैसे ग्रामीण ओलिंपिक बने किला रायपुर की खेल, जानिए

1933 में इंदर ग्रेवाल ने शुरू किया: किला रायपुर की ग्रामीण खेलों की शुरुआत साल1933 में हुई। इनको शुरू करने का श्रेय लुधियाना के किला रायपुर के इंदर सिंह ग्रेवाल को जाता है। इन खेलों को शुरू करने के पीछे उद्देश्य पंजाब के किसानों को एक प्लेटफार्म पर एकत्रित करना था। इनके मनोरंजन के लिए खेलें शुरू की गईं जो आगे चलकर पूरे पंजाब में फेमस हो गईं और इन्हें पंजाब का मिनी ओलिंपिक कहा जाने लगा।

रायपुर के हॉकी में सिल्वर कप जीतने से हुई शुरुआात: साल 1933 में पहली बार रायपुर की हॉकी टीम ने जालंधर में सिल्वर कप जीता। इसी जीत से प्रेरित होकर ग्रेवाल जट्‌ट समुदाय ने गांवों के बीच वॉलीबॉल, कबड्डी और एथलेटिक्स की शुरुआत हुई और उसी साल "ग्रेवाल स्पोर्ट्स एसोसिएशन" बनाई गई।

1944 में पहली बार हुई बैल दौड़: साल 1940 में 440 गज का ट्रैक बनाकर एथलेटिक्स के मुकाबले शुरू हुए और साल 1944 में बाबा बक्शी के प्रयासों से बैलगाड़ी दौड़ शामिल की गई। साल 1950 में महिलाओं के लिए खेल आयोजनों की शुरुआत हुई, जो साल 1953 में औपचारिक रूप से शामिल किए गए।

दुनियाभर को दिखाई जाती है पंजाब की विरासत: इंदर सिंह ग्रेवाल के प्रयासों के कारण, यह खेलें त्योहार की तरह बन गईं और हर साल आयोजित होने लगीं। अब ये खेलें दुनिया भर से लोगों को आकर्षित करती हैं। यह न केवल एक खेल आयोजन है, बल्कि एक सांस्कृतिक उत्सव भी है जो पंजाब की समृद्ध विरासत को दुनियाभर में दिखाता है।

बैलों को पिलाते हैं देसी घी, खिलाते हैं ड्राई फ्रूट्स: बैलगाड़ी दौड़ में हिस्सा लेने वाले बैलों की कीमत लाखों रुपए तक होती है और उनकी देखभाल बच्चों की तरह की जाती है। पंजाब के पशुपालक बताते हैं कि वे अपने बैलों को देसी घी, ड्राई फ्रूट्स, चुनिंदा अनाज और पोषक आहार खिलाकर उन्हें ताकतवर बनाते हैं।

अब जानें क्यों लगा बैलों की दौड़ पर प्रतिबंध

जीत के लिए बैलों को नशे की गोलियां खिलाने के लगे आरोप: इन खेलों में बैल दौड़ पर सवाल उठने शुरू हो गए। कुई पशु प्रेमियों ने पशु क्रूरता को लेकर कोर्ट का रुख किया। शिकायतकर्ताओं का आरोप था कि कुछ मालिक अपने बैलों को दौड़ के दौरान तेज भगाने के लिए नशे की गोलियां खिलाते हैं और लोहे की नुकीली 'क्रिच' से मारते हैं, जिससे बैल दर्द से भागने लगता है।

बैलों पर क्रूरता का हवाला देकर लगी थी रोक: साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद किला रायपुर समेत देशभर में बैलगाड़ी दौड़ों पर रोक लग गई थी। अदालत ने पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 का हवाला देते हुए कहा था कि इस तरह की दौड़ों में जानवरों के साथ क्रूरता की आशंका रहती है। इसके बाद किला रायपुर रूरल ओलिंपिक में यह प्रतियोगिता बंद कर दी गई।

2014 के बाद से फीका पड़ा खेल उत्सव: साल 2014 के आदेश और पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के निर्देश के बाद कानूनी रूप से बैल दौड़ पर बैन लगने के बाद किला रायपुर में खलों का आकर्षण फीका पड़ने लगा। धीरे-धीरे यहां आने वाले लोगों की संख्या भी कम होने लगी।

विवादों से भी जुड़ा किला रायपुर ग्रामीण ओलिंपिक: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट की रोक के आदेश को 11 साल बीत चुके हैं और कभी भी यहां बैल दौड़ देखने को नहीं मिली। बैल दौड़ के जाने के बाद यहां और भी विवाद पैदा हुए और ये खेल आयोजन कुछ सालों में ही बंद हो गया।

विवाद उस समय और गहरा गया जब आयोजन स्थल की जमीन को लेकर कानूनी मसला खड़ा हो गया, जिससे साल 2018 के बाद खेल आयोजन पूरी तरह रुक गया। साल 2023 में गांव के पट्टी सुहाविया गुट के पक्ष में फैसला आने के बाद आयोजन को दोबारा शुरू करने की राह साफ हुई। साल 2024 से पंजाब सरकार ने खेलों के आयोजन की जिम्मेदारी अपने हाथ में ली।

पहले भी इसे शुरू करने के दो प्रयास हो चुके: पंजाब सरकार ने 2019 में विधानसभा में एक संशोधन विधेयक पारित किया था, जिससे बैल दौड़ को कानूनी मान्यता मिल सके। इसके तहत पशुओं की देखभाल और सुरक्षा से जुड़े विशेष प्रावधानों के साथ पारंपरिक खेल को संरक्षित करने की बात कही गई थी।

2024 में भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता जयवीर शेरगिल ने केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी से मुलाकात कर इस खेल को दोबारा शुरू कराने की मांग भी की थी। अब 2025 में राज्य सरकार ने इस दिशा में अंतिम कदम बढ़ा दिया है। पंजाब विधानसभा ने सर्वसम्मति से विधेयक को पारित कर दिया है। राज्यपाल की मंजूरी मिलते ही बैल दौड़ को कानूनी दर्जा मिल जाएगा।

बैल दौड़ के अलावा ये मुकाबले भी फेमस: बैल दौड़ के अलावा इस आयोजन में पुरुष और महिला हॉकी, अंडर-14 और अंडर-17 बालिकाओं के लिए कबड्डी, 60 मीटर और 100 मीटर दौड़, 1500 मीटर महिला-पुरुष रेस, 400 मीटर की हीट और फाइनल, खो-खो, पुरुष वॉलीबॉल, शूटिंग और पारंपरिक ग्रामीण खेलों की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं।

ट्रैक्टर दौड़, कुत्तों की रेस, खच्चर रेस, निहंग सिंहों के घोड़ों पर करतब, करतब बाजों के करतब विशेष आकर्षण के केंद्र रहते हैं। रात को बड़े सिंगरों के अखाड़े लगते रहे हैं। देखना होगा कि प्रशासन इस बार किस तरह की तैयारियां करता है।

हॉकी में जीत की हैट्रिक वाली टीम को मिलती है 1 किलो सोने की ट्रॉफी: बात साल 1956 की है, पाकिस्तान की टीम ने पहली बार किला रायपुर की खेलों में कबड्डी कर में भाग लिया। ग्रामीण खेलों में भाग लेने के वाली ये पहली विदेश की टीम बनी। इसके बाद नारंगवाल के प्रह्लाद सिंह गरेवाल ने अपने बेटे की भगवंत सिंह की याद में 100 तोले (1 किलो) सोने का कप दिया। तब से "भगवंत गोल्ड कप" हॉकी टूर्नामेंट शुरू हुआ।

खेलों के वक्त ही बैंक लॉकर से निकाली जाती है ट्रॉफी: ग्रेवाल स्पोर्ट्स एसोसिएशन के पास दो बेशकीमती ट्रॉफी हैं, एक 100 तोले शुद्ध सोने का कप और दूसरा 50 तोले चांदी का कप। इन दोनों ट्राफियों को वर्षभर बैंक के लॉकर में सुरक्षित रखा जाता है और केवल पुरस्कार वितरण के दिन ही इन्हें बाहर निकाला जाता है।

 

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