पूर्व पार्षद रानी बेगम ने 21 साल बाद अपनाया हिंदू धर्म, कहा- इस्लाम में घुटन महसूस होती थी

Jan 30, 2026 - 08:44
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पूर्व पार्षद रानी बेगम ने 21 साल बाद अपनाया हिंदू धर्म, कहा- इस्लाम में घुटन महसूस होती थी

छतरपुर 
छतरपुर में वार्ड क्रमांक 11 की पूर्व पार्षद रानी बेगम ने साधु-संतों की मौजूदगी में विधि-विधान से पुनः हिंदू धर्म अपनाते हुए घर वापसी की। इस अवसर पर हनुमान जी को साक्षी मानकर हवन-पूजन किया गया और गंगाजल छिड़ककर शुद्धिकरण संपन्न कराया गया। घर वापसी के बाद उन्होंने अपना मूल नाम शीला यादव पुनः धारण किया।

वर्ष 1995 में साबिर काजी के साथ निकाह कर इस्लाम धर्म अपनाया

शीला यादव मूल रूप से छतरपुर जिले के ग्राम कुर्रा, थाना ईसानगर की निवासी हैं। जो वर्तमान वार्ड नंबर 12 मैं रह रही है उन्होंने बताया कि उनका बचपन का नाम शीला यादव था और उनके पिता का नाम चिंटोले यादव है। वर्ष 1995 में साबिर काजी के साथ निकाह कर इस्लाम धर्म अपनाया और करीब 21 वर्षों तक वैवाहिक जीवन व्यतीत किया। हालांकि, वहां की परंपराओं और जीवनशैली को स्वीकार न कर पाने के कारण वर्ष 2018 में उन्होंने तलाक लेकर हिंदू धर्म पुनः अपना लिया था, लेकिन धार्मिक विधि से घर वापसी नहीं हो सकी थी। 

शीला यादव का कहना है कि बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री द्वारा घर वापसी और हिंदू राष्ट्र को लेकर चलाए जा रहे अभियान से वे प्रेरित हुईं। उन्होंने कहा कि भारतीय और हिंदू होने के नाते हिंदू धर्म ही उनकी आत्मा से जुड़ा है।

उन्होंने बताया कि नाम परिवर्तन को लेकर समाचार पत्रों में इश्तिहार प्रकाशित कराया, आधार कार्ड में नाम अपडेट कराया, लेकिन प्रशासनिक दस्तावेजों में रानी बेगम से शीला यादव नाम दर्ज कराने के लिए वे पिछले एक वर्ष से कलेक्टर कार्यालय के चक्कर लगा रही हैं। छतरपुर के साधू संतो औऱ सनातन धर्म सेवा समिति से संपर्क किया जहां एआज गुरुवार को अनगढ़ टोरिया में साधु-संतों की उपस्थिति में विधिवत घर वापसी कराई गई

शीला यादव बोलीं, जैसे पुनर्जन्म  हुआ हो..

शीला यादव ने कहा कि मैंने यादव कुल में जन्म लिया था और मैं यादव परिवार में पली बढ़ी। वो याद करते हुए कहती हैं कि  मैने शादी के बाद इस्लाम कुबूल किया और 20-25 साल तक मैं साबिर काजी के साथ मुस्लिम रीतिरिवाज के साथ रही, लेकिन ये रास नहीं आ रहा था, घुटन महसूस हो रही थी।  अब से मैं अपने धर्म और समाज में जीना मरना चाहती हूँ। रानी बताती हैं कि इन बीच रानी बेगम बतौर निर्दलीय चुनाव लड़ा और पार्षद रही, लोगों की जनसेवा की, पर जो सुकून अपने धर्म में था और है वो कहीं नहीं हैं मैं मजबूरी में घुट-घुट कर जीती रही।   

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