भारत का मुरीदके पर हमला: पाक मौलाना का आरोप, मुनीर को किया धोया

Dec 23, 2025 - 13:44
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भारत का मुरीदके पर हमला: पाक मौलाना का आरोप, मुनीर को किया धोया

इस्लामाबाद

पाकिस्तान की सत्ता और फौजी नेतृत्व के अंदर दोगलेपन पर अब खुद पाकिस्तान के धार्मिक नेतृत्व ने सवाल खड़े कर दिए हैं. कराची में आयोजित ‘पाकिस्तानी उम्मा की एकता’ सम्मेलन में मौलाना फजलुर रहमान ने जनरल आसिम मुनीर की रणनीतिक सोच को सीधे कटघरे में खड़ा कर दिया. मौलाना ने सवाल उठाया कि पाकिस्तान आखिर अफगानिस्तान पर हमला क्यों कर रहा है. साथ ही तर्क दिया कि अगर पाकिस्तान काबुल पर बमबारी को ‘दुश्मनों के ठिकानों पर जायज स्ट्राइक’ बताता है, तो फिर अगर भारत मुरीदके या बहावलपुर में हमला करे तो वह आपत्ति किस आधार पर कर सकेगा?
पाकिस्तान के दोगलेपन पर हमला

मौलाना फजलुर रहमान ने तीखे शब्दों में कहा कि काबुल पर बमबारी किसी भी संप्रभु देश की राजधानी पर हमला है, और यह ठीक वैसा ही है, जैसे कोई इस्लामाबाद पर बम गिरा दे. उन्होंने पूछा, अगर पाकिस्तान यह दावा करता है कि उसने अफगानिस्तान में ‘अपने दुश्मन TTP के ठिकानों पर हमला किया, तो भारत जब बहावलपुर, मुरीदके या कश्मीर में आतंकी ढांचों पर कार्रवाई की बात करता है, तो उस पर ऐतराज क्यों?’ यहां मौलाना भारत की ओर से किए गए ऑपरेश सिंदूर का जिक्र कर रहे थे.

मौलाना ने साफ तौर पर पाकिस्तान के दोगलेपन पर हमला बोला है. पाकिस्तान एक तरफ अफगानिस्तान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को वैध ठहराता है, दूसरी तरफ भारत के हर जवाबी कदम को ‘आक्रामकता’ बताता है. मौलाना के शब्दों में दोनों मामलों में तर्क एक जैसा है, फिर रवैये अलग क्यों?
‘ताकत देखकर हमला करता है पाकिस्तान’

मौलाना ने पाकिस्तान का एक और दोगलापन दुनिया के सामने रखा. पाकिस्तान ने ईरान के भीतर स्ट्राइक को भी यह कहकर जायज ठहराया कि बलूचिस्तान में हिंसा के ठिकाने ईरान में हैं. लेकिन जब ईरान ने जवाबी कार्रवाई की, तो पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शोर मचाया. मौलाना का कहना है कि ईरान एक स्थापित और ताकतवर देश है, जिसे दुनिया उखाड़ नहीं सकती, लेकिन अफगानिस्तान को कमजोर समझकर अलग रवैया अपनाया जा रहा है.
प्रो-पाकिस्तान अफगानिस्तान की तलाश

मौलाना ने यह भी कहा कि पाकिस्तान 78 साल से एक ‘प्रो-पाकिस्तान अफगानिस्तान’ की तलाश हो रही है. जबकि हकीकत यह है कि अफगानिस्तान कभी भी स्थायी रूप से पाकिस्तान-समर्थक नहीं रहा. अमीरात-ए-इस्लामिया (वर्तमान तालिबान) को छोड़कर कोई भी व्यवस्था इस कसौटी पर खरी नहीं उतरी. ऐसे में नाराजगी के बाद राजधानी पर हमला करना हालात को और बिगाड़ता है, सुधारता नहीं.

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