पांढुर्णा का गोटमार मेला बनेगा फिल्म की कहानी, मुंबई से पहुंची टीम ने शुरू किया काम

Aug 24, 2025 - 10:14
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पांढुर्णा का गोटमार मेला बनेगा फिल्म की कहानी, मुंबई से पहुंची टीम ने शुरू किया काम

पांढुर्णा

मध्यप्रदेश के पांढुर्णा का प्रसिद्ध गोटमार मेला अब जल्द ही बड़े परदे पर दस्तक देने जा रहा है। पांढुर्णा की मिट्टी, जाम नदी के पत्थर और गोटमार की कहानी, जल्द ही बड़े परदे पर गूंजेगी। मुंबई की पल्स मीडिया और क्रेजी बैग्स एंटरटेनमेंट प्राइवेट लिमिटेड ने गोटमार पर फिल्म बनाने का ऐलान किया है।

फिल्म निर्माण से पहले परंपरा और लोक गतिविधियों का गहन अध्ययन करने के लिए शुक्रवार को मुंबई से एक विशेष दल पांढुर्णा पहुंचा। इस दल में निर्माता सौरभ गौड़, संगीत निर्देशक शैल आर. सैनी, कार्यकारी निर्माता दिव्यांश मिश्रा, अपार जैन, और प्रमुख सहयोगी जितेंद्र परमार, दीपक कुशवाह व उत्कर्ष चौधरी शामिल थे।

टीम ने किया स्थल का दौरा
पांढुर्णा पहुंचकर दल ने सबसे पहले गोटमार मेले की आराध्या मां चंडिका के दर्शन किए। इसके बाद टीम ने गोटमार स्थल का निरीक्षण किया और वहां मौजूद लोगों से बातचीत कर इस अनूठे मेले की परंपराओं और उससे जुड़ी मान्यताओं को समझा। मीडिया से चर्चा में निर्माता सौरभ गौड़ ने बताया- “गोटमार मेला अपनी अलग ही पहचान रखता है। इस परंपरा में आस्था, लोक संस्कृति और जनमानस की भावनाएं जुड़ी हुई हैं। हमारी कोशिश है कि फिल्म के माध्यम से इस मेले की लोकप्रियता केवल स्थानीय स्तर तक सीमित न रहे, बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी दर्शकों तक पहुंचे।

प्रेमी युगल की कहानी
गोटमार मेले की शुरुआत को लेकर एक किवदंती भी प्रचलित है। कहा जाता है कि पांढुर्णा का एक युवक सावरगांव की युवती से प्रेम करता था। एक दिन युवक अपनी प्रेमिका को लेकर पांढुर्णा लौट रहा था। जैसे ही वे जाम नदी के बीच पहुंचे, सावरगांव के लोगों को खबर मिल गई। युवती को रोकने सावरगांव के लोग पत्थरों के साथ पहुंचे और युवक पर हमला किया। जवाब में पांढुर्णा के लोग भी पत्थर बरसाने लगे। पत्थरों की इस मारा-मारी में अंततः प्रेमी युगल की जान चली गई। तभी से गोटमार मेले की परंपरा शुरू हुई और यह आयोजन हर साल आस्था, परंपरा और उस प्रेम कहानी की याद में होता आ रहा है। जिस पर अब फ़िल्म बनने जा रही है।

फिल्म से बढ़ेगा आकर्षण
टीम का मानना है कि गोटमार पर आधारित फिल्म दर्शकों के लिए रोचक और भावनात्मक अनुभव होगी। साथ ही यह परंपरा और संस्कृति का दस्तावेज बनकर आने वाली पीढ़ियों के लिए भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

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