धनबाद नगर निगम चुनाव में BJP-JMM का किला ध्वस्त, 8 साल जेल में रहकर मैदान में उतरे थे संजीव सिंह
धनबाद.
धनबाद की राजनीति में बीजेपी के बागी उम्मीदवार संजीव सिंह ने दमदार वापसी की है. दमदार इसलिए क्योंकि कि वे डिप्टी मेयर नीरज सिंह हत्याकांड में लंबे समय तक जेल में थे, लेकिन अदालत ने उन्हें उस केस से बरी कर दिया. वर्षों तक सलाखों के पीछे रहने के बाद जब वे सियासत के मैदान पर वापस लौटे तो उन्होंने नगर निगम चुनाव में मेयर पद के लिए दावेदारी ठोक दी.
उन्होंने बकायदा प्रदेश भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को पत्र लिखकर समर्थन की मांग की. लेकिन उन्हें समर्थन नहीं मिला. इसके बजाय पार्टी ने संजीव कुमार को अपना समर्थन दिया. दूसरी तरफ बीजेपी के कद्दावर नेता रहे चंद्रशेखर अग्रवाल ने भी समर्थन की आस में पार्टी से बगावत कर झामुमो का दामन थाम लिया. झामुमो ने चंद्रशेखर अग्रवाल को अपना समर्थन दिया. जबकि कांग्रेस ने शमशेर आलम को सपोर्ट करने का ऐलान कर दिया. ऐसे में संजीव सिंह ने बैगर किसी के समर्थन के मैदान में उतरने का फैसला किया. बस उनके इस निर्णय से लगने लगा था कि वह बीजेपी के वोट बैंक में बड़ी सेंध लगायेंगे. हुआ भी यही. उन्होंने झामुमो समर्थित पूर्व मेयर चंद्रशेखर अग्रवाल को 31,902 मतों के भारी अंतर से हरा दिया. इस जीत को धनबाद की राजनीति में बड़ा उलटफेर माना जा रहा है.
मतगणना में साफ दिखी बढ़त
चुनाव परिणामों के अनुसार, संजीव सिंह को कुल 1,43,362 मत मिले. वहीं चंद्रशेखर अग्रवाल को 82,460 वोट प्राप्त हुए. भाजपा समर्थित उम्मीदवार संजीव कुमार 57,895 लाकर चौथे स्थान पर रहे. कांग्रेस समर्थित प्रत्याशी शमशेर आलम को 59,079 वोट लाकर तीसरे स्थान पर रहे. संजीव सिंह शुरुआती राउंड से ही बढ़त बनाए हुए थे. धीरे धीरे यह बढ़त और मजबूत होती गयी और अंत में ये निर्णायक साबित हुई. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि इतनी बड़ी जीत के पीछे का कारण क्या है. आज हम इस लेख में यही चीज को समझने की कोशिश करेंगे.
युवाओं और सोशल मीडिया ने बदला माहौल
संजीव सिंह की जीत में युवाओं की भूमिका अहम रही. चुनाव के दौरान सोशल मीडिया पर उनके समर्थन में जबरदस्त माहौल बना. बड़ी संख्या में युवाओं ने न सिर्फ ऑनलाइन प्रचार किया, बल्कि बूथ स्तर पर भी सक्रियता दिखाई. इसका सीधा असर मतदान प्रतिशत और नतीजों पर पड़ा.
सहानुभूति लहर बनी ताकत
करीब आठ साल तक जेल में रहने और नीरज सिंह हत्याकांड में बरी होने के बाद संजीव सिंह के पक्ष में सहानुभूति की लहर बनी. आम लोगों के बीच यह संदेश गया कि उन्हें राजनीतिक साजिश के तहत फंसाया गया था. इस भावना ने मतदाताओं को उनके पक्ष में एकजुट किया.
भाजपा के कोर वोट बैंक में सेंध
निर्दलीय उम्मीदवार होने के बावजूद संजीव सिंह ने भाजपा के परंपरागत वोट बैंक में बड़ी सेंधमारी की. खासकर धनबाद और बागमारा क्षेत्र में भाजपा समर्थकों का बड़ा हिस्सा उनके साथ चला गया, जिससे मुकाबला एकतरफा होता चला गया.
‘अकेले योद्धा’ की बनी छवि
चुनाव के दौरान सभी बड़े दलों का निशाना सिर्फ संजीव सिंह पर रहा. विरोधियों की इस घेराबंदी ने मतदाताओं की नजर में उनकी छवि एक ‘अकेले योद्धा’ के रूप में बना दी. यही छवि उनके लिए निर्णायक साबित हुई.
2017 में जाना पड़ा था जेल
संजीव सिंह को वर्ष 2017 में अपने चचेरे भाई नीरज सिंह की हत्या की साजिश के आरोप में जेल जाना पड़ा था. वे अप्रैल 2017 से अगस्त 2025 तक न्यायिक हिरासत में रहे. 8 अगस्त 2025 को उन्हें सुप्रीम कोर्ट से स्वास्थ्य आधार पर जमानत मिली, जबकि 27 अगस्त 2025 को धनबाद की विशेष अदालत ने साक्ष्यों के अभाव में उन्हें पूरी तरह बरी कर दिया.
‘सिंह मेंशन’ परिवार की विरासत
संजीव सिंह प्रसिद्ध ‘सिंह मेंशन’ परिवार से आते हैं, जिसकी नींव उनके पिता सूर्यदेव सिंह ने रखी थी. झरिया और धनबाद की राजनीति में इस परिवार की गहरी पकड़ रही है. उनकी मां कुंती देवी विधायक रह चुकी हैं, जबकि वर्तमान में उनकी पत्नी रागिनी सिंह भाजपा से विधायक हैं.
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