कोकराझार में सत्ता की तैयारी शुरू, तोखन साहू उतारे गए मैदान में
कोकराझार आसाम-
असम की राजनीति में कई फैसले दिखने में साधारण होते हैं, लेकिन उनके पीछे छिपी रणनीति दूरगामी संकेत देती है। कोकराझार लोकसभा क्षेत्र को लेकर लिया गया ताज़ा संगठनात्मक निर्णय भी कुछ ऐसा ही है। केंद्रीय नेतृत्व ने इस संवेदनशील और राजनीतिक रूप से निर्णायक संसदीय क्षेत्र में केंद्रीय राज्यमंत्री तोखन साहू को प्रवासी प्रभारी बनाकर यह साफ कर दिया है कि यहां की राजनीति को अब केवल चुनावी गणित नहीं, बल्कि गहरे सामाजिक और संगठनात्मक समीकरणों के जरिए साधा जाएगा।
कोकराझार लोकसभा क्षेत्र सिर्फ एक संसदीय सीट नहीं है। यह बोड़ोलैंड क्षेत्र की राजनीतिक धुरी है, जहां जनजातीय अस्मिता, क्षेत्रीय संतुलन और विकास की आकांक्षाएं एक-दूसरे से टकराती भी हैं और जुड़ती भी। ऐसे क्षेत्र में संगठन को मज़बूत करने के लिए चेहरा नहीं, अनुभव चाहिए—और नेतृत्व ने इसी सोच के तहत तोखन साहू को आगे किया है।
तोखन साहू की पहचान एक ऐसे नेता के रूप में रही है, जिन्होंने संगठन निर्माण को भाषणों से नहीं, बल्कि ज़मीन पर कार्यकर्ताओं के बीच रहकर मजबूत किया। पार्टी के भीतर उन्हें समन्वयक, संवादकर्ता और रणनीतिक कार्यान्वयन करने वाले नेता के तौर पर देखा जाता है। उनकी नियुक्ति यह संकेत देती है कि पार्टी अब कोकराझार में केवल प्रतीकात्मक उपस्थिति नहीं, बल्कि स्थायी राजनीतिक पकड़ बनाना चाहती है।
रणनीतिक दृष्टि से यह फैसला कई स्तरों पर अहम है। पहला, यह कदम बोड़ोलैंड क्षेत्र में विभिन्न जनजातीय और सामाजिक समूहों के बीच भरोसा कायम करने की कोशिश को दर्शाता है। दूसरा, संगठनात्मक मजबूती के जरिए स्थानीय नेतृत्व को नई दिशा और अनुशासन देने का प्रयास भी इसमें छिपा है। तीसरा, यह संदेश भी साफ है कि केंद्र अब इस क्षेत्र को राजनीतिक रूप से हाशिये पर नहीं, बल्कि प्राथमिकता में रख रहा है।
कोकराझार जैसे क्षेत्र में राजनीति केवल सत्ता की नहीं, संतुलन की भी होती है। सामाजिक विविधता, सांस्कृतिक पहचान और विकास के प्रश्न यहां हर फैसले को संवेदनशील बना देते हैं। ऐसे में प्रवासी प्रभारी की भूमिका केवल संगठन चलाने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह राजनीतिक सेतु और संदेशवाहक की भूमिका भी निभाता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तोखन साहू की तैनाती आने वाले समय में संगठनात्मक गतिविधियों को गति देने के साथ-साथ क्षेत्रीय राजनीति में नए समीकरण गढ़ सकती है। यह नियुक्ति संकेत देती है कि पार्टी अब कोकराझार को लेकर रक्षात्मक नहीं, बल्कि आक्रामक और दीर्घकालिक रणनीति के साथ आगे बढ़ रही है।
कुल मिलाकर, यह फैसला बताता है कि कोकराझार में खेल सिर्फ उम्मीदवारों का नहीं, रणनीति, संगठन और सामाजिक संतुलन का है—और यही आने वाले राजनीतिक परिदृश्य की दिशा तय करेगा।
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