भारत-ऑस्ट्रेलिया-कनाडा ने बनाया नया ट्रायंगल, क्यों इसे माना जा रहा है गेमचेंजर?
नई दिल्ली
एक तरफ अमेरिका ट्रेड वॉर और भारी टैरिफ लगाकर अपनी अर्थव्यवस्था को समेट रहा है, तो दूसरी तरफ चीन ग्रीन टेक्नोलॉजी और क्रिटिकल मिनरल्स के बाजार पर एकाधिकार जमाकर बैठा है. इस खींचतान के बीच, दुनिया को एक नए और सुरक्षित रास्ते की तलाश थी. इसी तलाश को पूरा करने और चीन-अमेरिका पर निर्भरता को जड़ से खत्म करने के लिए तीन बड़े देशों ने हाथ मिलाया है. भारत, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा ने मिलकर एक नया और बेहद शक्तिशाली अलायंस बनाया गया है, जिसे ACITI यानी ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, इंडिया टेक्नोलॉजी एंड इनोवेशन ट्रायंगल नाम दिया गया है. यह नया ट्रायंगल सिर्फ एक डील नहीं है, बल्कि इससे दुनिया की ग्रीन सप्लाई चेन का पूरा गेम बदलने वाला है |
आज की दुनिया में तरक्की का मतलब क्लीन एनर्जी, इलेक्ट्रिक गाड़ियां, सोलर पैनल और विंड टर्बाइन है. इन सभी को बनाने के लिए लिथियम, कोबाल्ट, ग्रेफाइट और रेयर अर्थ एलिमेंट्स जैसे खनिजों की जरूरत होती है.दिक्कत यह है कि इन खनिजों को निकालने और रिफाइन करने के बाजार पर चीन का लगभग पूरा कब्जा है. ग्रीन हाइड्रोजन बनाने वाले इलेक्ट्रोलाइजर की सप्लाई भी चीन ही कंट्रोल करता है. दूसरी ओर, अमेरिका ने अपनी नई नीतियों और टैरिफ से दुनिया भर के व्यापार को डरा दिया है. एक देश (चीन) पर पूरी तरह निर्भर रहना अब दुनिया के लिए एक बड़ा खतरा बन चुका था. ACITI गठबंधन इसी सिंगल-कंट्री डिपेंडेंस को तोड़ने का अचूक हथियार है | कैसे काम करेगा यह नया ट्रायंगल?
यह गठबंधन तीन देशों की अलग-अलग ताकतों को मिलाकर एक सुपर-पावरफुल सप्लाई चेन बनाएगा. इस साझेदारी का फोकस मुख्य रूप से क्लीन एनर्जी, क्रिटिकल मिनरल्स और लॉन्ग-टर्म आर्थिक सुरक्षा पर होगा |
ऑस्ट्रेलिया की ताकत: ऑस्ट्रेलिया दुनिया में लिथियम का सबसे बड़ा उत्पादक है. यानी एक तरह से लीडर है. लिथियम वह मुख्य धातु है जिससे हर तरह की बैटरी बनती है |
कनाडा की ताकत: कनाडा के पास क्रिटिकल मिनरल्स का भारी भंडार है और वह ग्रीन टेक्नोलॉजी को विकसित करने के लिए भारी फंड्स और नीतियां बना रहा है |
भारत की ताकत: भारत दुनिया का सबसे बड़ा और तेजी से बढ़ता बाजार है. भारत ने 2030 तक 500 गीगावॉट रिन्यूएबल एनर्जी पैदा करने का विशाल लक्ष्य रखा है. यानी भारत के पास इस नई तकनीक की सबसे ज्यादा डिमांड है |
जब ऑस्ट्रेलिया का कच्चा माल, कनाडा की तकनीक-पैसा और भारत का विशाल बाजार और मैन्युफैक्चरिंग स्केल एक साथ मिलेंगे, तो यह तिकड़ी चीन के एकाधिकार को सीधी और कड़ी टक्कर देगी |
सिर्फ मुनाफा नहीं, धरती को बचाना है लक्ष्य
अक्सर ऐसे बड़े गठबंधन सिर्फ पैसा कमाने के लिए बनते हैं, लेकिन ACITI का नजरिया अलग है. इस गठबंधन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वे अपना ध्यान सिर्फ स्मार्टफोन बनाने या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बुलबुले में पैसा फूंकने पर न लगाएं. इस ट्रायंगल का असली लक्ष्य टेक-फॉर-गुड यानी भलाई के लिए तकनीक बनाना है. इसके तहत तीनों देश मिलकर काम करेंगे कि खनिजों का खनन पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना कैसे हो. पुरानी बैटरियों और इलेक्ट्रॉनिक कचरे से लिथियम, कोबाल्ट और तांबे को दोबारा कैसे निकाला जाए. यह गठबंधन सर्कुलर इकॉनमी यानी जहां चीजें बर्बाद न हों, बल्कि बार-बार इस्तेमाल हों, उस पॉलिसी को बढ़ावा देगा |
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