गढ़वा में अनोखा फैसला, गांव में बना ‘यूट्यूब चौक’ बना चर्चा का विषय

Apr 16, 2026 - 14:44
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गढ़वा में अनोखा फैसला, गांव में बना ‘यूट्यूब चौक’ बना चर्चा का विषय

गढ़वा

 झारखंड के गढ़वा में ग्रामीणों ने एक चौक नामकरण किसी महापुरुष के नाम पर नहीं किया, बल्कि इस चौक का नामकरण एक सोशल मीडिया कंपनी के नाम पर किया है। इस नामकरण के पीछे ग्रामीणों की ओर से ऐसा तर्क भी दिया गया है, जिससे पता चलता है लोगों में रचनात्मकता और तकनीक के प्रति काफी सम्मान है।

यह यू-ट्यूब चौक गढ़वा जिले के रंका प्रखंड के विश्रामपुर पंचायत में अवस्थित है। चौक के समीप पंचायत की मुखिया जीना देवी के प्रयास से 15वें वित्त मद से लोगों के बैठने के लिए कुर्सी की व्यवस्था भी की गई है, ताकि यहां आकर लोग बेहतर नेटवर्क का फायदा उठा सके।

यू-ट्यूब बना जानकारी का मुख्य स्रोत
गढ़वा के जिला परिवहन पदाधिकारी धीरज प्रकाश का कहना है कि स्थानीय लोगों ने बताया कि यहां इंटरनेट कनेक्शन अच्छा पकड़ता है और यू-ट्यूब अच्छा चलता है, जिससे वे लोग अपने काम की लगभग सारी जानकारियों को देख और सुन पाते हैं। इसी कारण यू-ट्यूब के सम्मान में उन लोगों ने ऐसा नामकरण किया।

स्थानीय लोगों का यह कहना कि यहां नेटवर्क बेहतर है और यू-ट्यूब उनके काम की जानकारी का मुख्य स्रोत बन गया है। लोगों का मानना है कि 'डिजिटल साक्षरता' ने अब गांवों में विकास की नई राहें खोल दी हैं।

डिजिटल युग की पहुंच सुदूर ग्रामीण अंचलों तक
सोशल मीडिया पर लोगों को इस चौक के बारे में जानकारी मिली। लोग इसे वाकई एक बहुत ही दिलचस्प और अनोखा फैसला मान रहे हैं। गढ़वा के ग्रामीणों की यह रचनात्मकता और तकनीक के प्रति उनका यह सम्मान न केवल प्रेरणादायक है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि डिजिटल युग की पहुंच अब देश के सुदूर और ग्रामीण अंचलों तक किस गहराई से हो गई है।

अनोखे नामाकरण के कुछ रोचक पहलू
गढ़वा के यू-ट्यूब चौक को सोशल मीडिया पर लोग ग्रामीण संस्कृति और आधुनिकता का संगम मान रहे हैं। सभी इस बात को लेकर भी अचंभित की जहां लोग अक्सर अपने चौक-चौराहों का नाम महापुरुषों या स्थानीय देवताओं के नाम पर रखते हैं, वहां 'यू-ट्यूब चौक' का होना यह बताता है कि आज के दौर में 'सूचना और ज्ञान' को लोग कितना महत्व देने लगे हैं।

यह नाम न केवल उस स्थान की पहचान बन गया है, बल्कि यह उन सरकारी और निजी कंपनियों के लिए भी एक फीडबैक है कि अगर सही कनेक्टिविटी दी जाए, तो ग्रामीण भारत अपनी प्रगति की पटकथा खुद लिख सकता है।

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