कॉरिडोर मुआवजा घोटाले की जांच ठंडे बस्ते में, अभियोजन स्वीकृति के अभाव में कार्रवाई अटकी

Apr 29, 2026 - 09:14
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कॉरिडोर मुआवजा घोटाले की जांच ठंडे बस्ते में, अभियोजन स्वीकृति के अभाव में कार्रवाई अटकी

चंडीगढ़.

अमृतसर-कोलकाता कारिडोर के लिए अधिग्रहित 1104 एकड़ जमीन के मुआवजे में कथित अनियमितताओं से जुड़े बहुचर्चित केस में पूर्व कांग्रेस विधायक मदन लाल जलालपुर के खिलाफ कार्रवाई फिलहाल ठहर गई है। इस की वजह अभियोजन स्वीकृति का ना मिलना है।

विजिलेंस ब्यूरो (वीबी) ने केस में चार्जशीट और सबूत अदालत में पेश करने की तैयारी कर ली थी, लेकिन राज्य सरकार से जरूरी मंजूरी न मिलने के कारण ट्रायल शुरू नहीं हो पा रहा है। वीबी के मुताबिक, केस की एफआईआर 26 मई 2022 को दर्ज हुई थी और 28 फरवरी 2023 को जलालपुर को नामजद किया गया। जांच में भारतीय दंड संहिता की धारा 406, 420, 409, 465, 467, 468, 471, 120-बी के साथ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 13(1)(ए) व 13(2) के तहत आरोप जोड़े गए।

शुरुआती एफआईआर में थे 27 आरोपित
शुरुआती एफआईआर में 27 आरोपित थे, जो जांच बढ़ने के साथ 34 तक पहुंच गए। इनमें सरकारी विभागों के अधिकारी, कर्मचारी और कुछ निजी फर्में भी शामिल हैं। कम से कम 10 फर्मों के खिलाफ भी कार्रवाई दर्ज की गई। जांच एजेंसी के अनुसार, पटियाला के शंभू ब्लॉक के अक्खरी, सेहरा, सेहरी, तख्तुमाजरा और पाबरा गांवों की जमीन कारिडोर के लिए अधिग्रहित की गई थी। इस जमीन के बदले करीब 205 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया, जबकि पंचायत की लीज होल्ड जमीन के लिए अलग से 97.8 करोड़ रुपये दिए गए।

वीबी का आरोप है कि मुआवजे और विकास कार्यों के नाम पर बड़ी रकम की गई। कई परियोजनाएं कागजों में पूरी दिखाईं गईं, जबकि जमीनी स्तर पर काम तय तकनीकी मानकों पर खरा नहीं उतरा।
जांच में यह भी सामने आया कि निर्धारित नियमों के तहत कुल फंड का करीब 30 फीसदी ब्लाक डेवलपमेंट एंड पंचायत आफिसर (बीडीपीओ) कार्यालय के सचिव के वेतन खाते में जमा होना था, लेकिन इसमें भी अनियमितताओं के संकेत मिले। रिपोर्ट के अनुसार, शेष राशि का केवल 10% ही वास्तविक विकास पर खर्च हुआ, जबकि करीब 65 करोड़ रुपये कागजी खर्च के तौर पर दिखाए गए।

अदालत में 2024 में हुई थी चुनौती पेश
अदालत में 2024 के दौरान चुनौती पेश की गई थी, लेकिन अभियोजन स्वीकृति न होने से सुनवाई आगे नहीं बढ़ सकी। सूत्रों के अनुसार, पंजाब विधानसभा अध्यक्ष के स्तर से मंजूरी की प्रक्रिया जुड़ी होने के कारण फाइल लंबित है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने पुष्टि की कि जैसे ही मंजूरी मिलेगी, केस को दोबारा गति दी जाएगी।

इधर, राज्य में विजिलेंस की कार्रवाई के दायरे में कई बड़े राजनीतिक चेहरे भी हैं। ओम प्रकाश सोनी, कुशलदीप सिंह ढिल्लों, साधु सिंह धर्मसोत, बिक्रम सिंह मजीठिया, सत्कार कौर गेहरी, अमित रतन कोटफट्टा और रमन अरोड़ा जैसे नाम अलग-अलग मामलों में जांच या ट्रायल का सामना कर रहे हैं। ऐसे में जलालपुर केस में देरी ने यह बहस तेज कर दी है कि क्या बड़े मामलों में कानूनी प्रक्रिया ‘मंजूरी’ की शर्त पर ही अटकती रहेगी।

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